Thursday, July 5, 2018

संजू...इमेज मेकओवर का मास्टरपीस !!!

आज एक ऐसी फिल्म के बारे में बात करनी है जो की इस साल की सबसे कामियाब फिल्म बनने जा रही है...नाम है 'संजू'। पिछले हफ्ते रिलीज़ हुई इस फिल्म की ज़्यादातर लोग बहोत तारीफ़ कर रहे हैं और फिल्म ज़बरदस्त पैसा बना भी रही है । पर क्या वाकई ये इतनी उमदा और बेहतरीन फिल्म है??

जवाब है... ना ।  संजू...फिल्म नहीं, इमेज मेकओवर का मास्टरपीस है !

कुछ क्षणों के लिए भूल जाईये की ये एक जानेमाने फिल्म एक्टर के जीवन पर बनी फिल्म है और सोचिये । क्या ऐसी ही कहानी कोई आम आदमी की होती या फिर काल्पनिक ही होती तो क्या उसे भी उतना ही प्यार और पैसा मिलता?

बिलकुल नहीं ।

इस फिल्म को अगर आप ज़रा गौर से देखे तो केवल एक ही नज़रिये से दिखाई गयी कहानी है कि 'वह बेगुनाह है'। क्या वाकई?

ज़रा सोचिये, कौन सा सीधा आदमी हर तरह के ड्रग्स लेता है और फिर भी साफ़ रहता है? पापा से सभी डरते है और माँ भी बीमार होती है, तो क्या ड्रग्स लेना शुरू कर दे?  कौन सा साफ़ आदमी अपने परिवार की सुरक्षा के लिए एके-56 रखता है? क्या जो गन नहीं रखते उन्हें अपने परिवार की फिक्र नहीं? और 350 से ज़्यादा लड़कियों के साथ सोना कौन से संस्कार है? शबडकोष में विशेष शब्द है इसके लिए।

फिल्म में माँ-बाप को पूरी तरह लाचार बताया गया है और हम मान भी ले? अरे हमारे आसपास कोई बच्चा ज़रा सी शैतानी कर दे तो भी हम बोल देते है की 'क्या ऐसे  संस्कार दिए है माँ-बाप ने' और यहाँ तो हर गुनाह पे माँ-बाप से बस मिलती है तो हौंसला अफ़ज़ाई और उम्मीद की सलाह! वाह !

ऐसा कैसे मुमकिन है की कोई आदमी जीवन में जो भी गुनाह करता है सब औरों की या हालात की वजह से? और अगर यह सब जायज़ है तो फिर तो कोई गुन्हेगार हो ही नहीं सकता...क्योंकि सारा खेल ही संग और समय का है। जब कुछ नहीं बचता तो मामला मिडीया पे थोप दो क्योंकि उन्हें 'मसाला' चाहिए! अरे भाई, अगर ऐसा ही होता तो वह मसाला औरों के नाम पे क्यों नहीं छपा? दुसरे भी तो कलाकार थे और है।

यह तो हुई बात मुख्य किरदार की जिस पर फिल्म बनी  है। अब अगर मैं इसे एक फिक्शनल मूवी के नज़रिये से देखूं तो भी कहाँ कोई दम है? फिल्म कुछ चुनिंदा सीन्स को जोड़ के बनाई हो ऐसे चलती है । दो कलाकार रणबीर और विक्की  कौशल की अदाकारी ने जान भरी है फिल्म में । भावनात्मक परिस्थितियाँ दिखा कर और उन्हें शब्दों की माला में सजा कर परोस दिया बस ।

हिरानी जी, यह 'बॉयोपिक' तो नहीं है, यह तो बस आप का 'नजरिया' है जो आप ने एक 'इमेज मेकओवर' के लिए इस्तेमाल कर लिया। इल्यूज़न ऐसा तो क्रिएट किया कि लोग देख भी रहे हैं और समझ भी नहीं पा रहे कि वाकई क्या देखने आये थे और क्या देख के जा रहे है!

लगे रहो राजू भाई...

Friday, August 11, 2017

Big Films....Poor Collections...How Long?

Barring Bahubali 2 (which wasn't an original Hindi film), 2017 has been a very dull year for Bollywood so far. Biggest names of the industry have garnered some of the weakest numbers, be it Tubelight, Jagga Jasoos or JHMS. Halls are running empty. So is this really surprising or alarming?

There may be many factors and reasons for this dull show till date. But what I feel is, this is a healthy scenario which should have happened much earlier than this. Audiences were being taken for granted for last so many decades and till before few years, they had to accept whatever was offered to them. But things have changed drastically within last year or two. 

First there were smartphones and then came the cheap data. The tsunami of cheap data has changed the entire pattern people used to consume the content. In the times of 'real time updates, audiences are evolving faster than one could imagine. When anything and everything you like is available at your fingertips, why to wait for a so called 'inspired' one? Gone are the days when people used to stand in long queues for tickets to see their favourite stars on big screen. Times have changed and they are their in your pocket screen everywhere. 

Here I am not at all denying the fan following of the big names in the industry. They have the power to pull in the crowd, but up to a certain level only. Rising ticket prices and easy access to better contents are two biggest factors coming in between a star and a fan paying to see him or her. Readiness to pay for a star only is decreasing with time. Also, the rise in number of options of  'out of home' activities play a big role, too.

Time has come for the makers of movies to take the audience more seriously and offer them more than just another 'typical Bollywood' movie. Many times in the past, people have followed Bollywood trends, but now is the time for Bollywood to follow the trend and that's to move away from trend. Be creative, be original and we will happily pay for the ticket.



Tuesday, May 2, 2017

रोज़ सरहद पर होती है कुरबानी

आजकल देश की सेना पर रोज़ लगभग रोज़ हमले हो रहे हैं।  शायद देश को 'शहादत' की खबरों की इतनी आदत हो गई है की ज़्यादातर लोग अब इस बात पर गौर भी नहीं करते।  लेकिन सवाल ये है की आखिर कब तक हम यूँ ही सुनते रहे और सहते रहे? क्यों हमारे जवानों की ज़िन्दगी की अहमियत हम समझते नहीं? क्यों हमारा खून नहीं खौलता ये रोज़ के बलिदानों से? क्यों हम चुपचाप इसे बर्दाश्त कर रहे हैं?

हर सिपाही किसी घर का सदस्य भी होता है और उसकी ज़िन्दगी भी उसके परिवार के लिए इतनी ही किमती है जितनी आपकी और मेरी हमारे परिवार के लिए।  लेकिन शायद हम सवाल करना भूल गए हैं।  शायद हमें चुपचाप सहने की आदत सी लगी है।  लेकिन कल जो हुआ उस से भी खून ना खुले तो फिर सवाल हम पे उठने चाहिए ना की किसी  और पे...


रोज़ सरहद पर होती है कुरबानी
रोज़ घिसे पिटे दावों की वही कहानी
कब तक बर्दाश्त करें हम बोलो
अब ना खौले खून तो बर्बाद ज़िन्दगानी।

कोई जवाब तो देना ही चाहिए
इससे ज़्यादा ना आज़माइए
और ना सहा जाए कोई वार
ज़बाँ भी अब उनकी अपनाइए।

कब तक झूठा सीना तान चलना
अपनी ही बात कह कर मुकरना
होंसले कहीं पस्त ना हो जाये
वक़्त पे पड़ेगा अब कर गुज़ारना।

-ताइर

Friday, April 7, 2017

Our obsession with politics

We are a nation highly obsessed with politics. Politics is what we eat, drink and breathe. It runs into our blood. People of our great nation turn to news channels for entertainment more than the real news. Checkout the shows!!! Starting from government forming to decision making at home, everything is filled with politics. We rarely think of something as 'for all'. Most of our thoughts are based upon what is there for me?

Yes, it's human nature to think and behave for self benefit. But to become a great nation, we must rise above this. The people of great nations on this planet have taught us that, time and again.

We are a nation surprisingly sentimental about things that matter less on a larger prospective. We care about Bollywood and Cricket much more than our neighbors. We worry about celebrities more than our near and dear ones.

We are unable to unite for one single cause. We are not only unable to rise above religion and castes, but have been diving deep into that well which divides us as a nation. Reservation has been used as a political tool to fool people and earn votes. 

Pollution, corruption, education, healthcare, infrastructure, employment, etc. are those of many issues which we must be discussing and asking questions about, but we are not. Yes we do discuss them now and then, but they haven't been our main tools for judging a government.


Something is wrong with us, right from the beginning and that may be our upbringing, education or mixture of all, but we are on the verge of failing as a society for sure. What is wrong and what is right is always debatable but only thing I am sure is, if it doesn't fall into the 'nation first' agenda, it's not right.

Sunday, April 2, 2017

बच्चे, पेरेंट्स और गैजेट्स

हम उस दौर में जी रहें हैं जहाँ टेक्नोलॉजीने हमारी ज़िन्दगी जितनी आसान कर दी है उतनी ही लाचार भी हैं। हम चीजों को आसान बनाने के चक्कर में शायद इतने उलझ गए की रुकना कहाँ है शायद हम समझ नहीं पा रहे।  और एक आम इंसान पर इसका फायदा जो हुआ है उतना ही नुकसान।

मेरे हम उम्र लोग इस बात  से बिलकुल तालुक रखेंगे की जो स्मार्टफोन उनके लिए दुनिया से जुड़े रहने का जरिया है, वहीँ उनके बच्चों के लिए खिलौना! बच्चे मैदान कम मोबाईल पर ज़्यादा होते हैं। बहोतों बार मैं देखा है की माता-पिता अपने बच्चों को मोबाईल ऑपरेट करते हुए देख एक गर्व सा महसूस करतें हैं। नहीं होनी चाहिए लेकिन मुझे थोड़ी तकलीफ ज़रूर होती हैं। जिस उम्र में बच्चें खेलने कूदने चाहिए, जिस से की उनका शारीरिक विकास ठीक से हो उस उम्र में गैजेट्स से उनको अपाहिज बनाने तक का काम हो रहा है  और वो भी गर्व से।  

और फिर पेरेंट्स की फ़रियाद भी होती हैं की बच्चा या तो मोबाईल से खेलता रहता हैं या टीवी देखता रहता हैं।  
मैं उन पेरेंट्स से पूछना चाहता हूँ की आखिर ये हुआ कैसे? क्या आपने कभी सोचा की बच्चा आपने जो किया वो ही कर रहा है और ना की जो कहा। बचपनमें हम देख कर सीखते है, सुन कर नहीं।  

बच्चे को जब आपका वक्त चाहिए तब आप खुद व्हाट्सएप्प या फेसबुक लेके बैठे रहते हैं। उसके सवालों का जवाब देने का वक़्त ही कहाँ था आपके पास।  आप उसके फोटो और विडियो पे वाहवाही कमाने बैठे थे।  बच्चा कुछ कर रहा है कैमरे की नहीं अपनी आँखों से देखो, उसे अच्छा महसूस होगया और होगा।  वरना बच्चा धीरे धीरे वही सारी चीज़ें सीखता रहा। मैं कुछ ऐसे पेरेंट्स को भी जानता हूँ जिन्होंने २-३ साल के बच्चे की प्रोफ़ाइल भी फेसबुक पे बना रक्खी हैं।  अरे, आखिर ज़रूरत क्या है? आपकी प्रोफ़ाइल ही काफ़ी नहीं क्या? उसका वक्त आने पे बच्चा भी बना ही लेगा ना। 

बच्चे को दुनिया में लाने वाले आप है।  उसे आपका वक़्त और प्यार चाहिए ना की लोगों की आपके सोशल मीडिया प्रोफाइल पे वाहवाही।  गैजेट्स को कमज़ोरी नहीं, ताकत बनाओ।  आदत नहीं, ज़रिया बनाओ।  या फिर उस दिन के लिए तैयार रहो जिस दिन बच्चा अपने ही घर में आप से व्हाट्सएप्प या स्नैपचैट से बात करेगा और आप पछताने के सिवा कुछ नहीं कर पाओगे।  

Sunday, November 13, 2016

ऐसी कतारें...

करेंसी बैन ने जीवन परिवर्तन कर दिया। २ दिन से जहाँ देखो वहाँ बस कतारें ही नज़र आ रही है। यह स्थिति किसी के लिए बड़ी दर्द दायीं है तो कोई इस हाल का लुत्फ़ उठा रहा है। मैंने अपनी समझ के हिसाब से इसे शब्द देने की कोशीश की...



लगी है ऐसी कतारें
बैंक और डाक खानों पर
सन्नाटा चींख रहा है
बाज़ार में खुली दुकानों पर।

A picture that speaks everything
शादी ब्याह का माहोल हो
या घर में कोई बीमारी
हाथ में लिए पैसा भी
सब पाते हैं लाचारी !

कुछ अपनी नोटों से, कुछ दूसरे हवालों से
परेशान सबका हाल है
पेहली बार कम या छोटी नोट वाला
लगता ज़्यादा खुशहाल है।

अफ़रातफ़री के माहोल में भी
कुछ तो अच्छी सीख है जो लो
बस नॉट नहीं लोग भी कमाओ
कागज़ से ही ना सब तोलो।

- ताइर

Sunday, July 17, 2016

कितना हसीन ये मौसम लगता है...

कितना हसीन ये मौसम लगता है
जब बादलों की रजाई ओढ़े
सूरज आसमान में सो जाता है

और पत्ते शाखों पर 
पहली बारिश में नहा कर
पूरे रंग से जब लहराते हैं

पंछी चहचहाने लगे
भीनी धरती से महेक उठे
और हवाएँ मद्धम सी बहे

तब गरम चाय की चुस्कियाँ
यारों की वो मस्तियाँ
सब यादें ताज़ा हो जाए



और वो बारिश की शाम
जब हाथों को थाम
बैठे थे पहलू में उसके

अज़ीज़ हर लम्हा तब उभरता है
कितना हसीन ये मौसम लगता है!

- ताइर

Monday, June 6, 2016

मेरी पसंद के चंद शेर

वो जो मेरी नाकामी की दुआएँ माँगते थे,
सुना है अब खुदा पे ही यकीन नहीं रखते!

इतनी खुराफ़ाती भी अच्छी नहीं है दिल,
लोग बुरा मान जातें है, बेपर्दा जो मिल।

मुनासिब कहाँ की सरेआम, हम ले नाम,
दोस्तों का काम था, सो कर गए तमाम!

थोड़ा 'हरामीपन' भी ज़रूरी है,
साफ़ दिल, दुनिया समझे मज़बूरी है!

रिश्तों में बदलाव आना लाज़मी था,
अब मैं उसी के रुख़ का आदमी था।

कुछ अधूरे ख्वाब यूँ भी बर आते हैं,
जब निगाह बंध हो, साफ नज़र आते हैं।

माना धुंधला है रास्ता पर नज़र तो है,
पहुँचना है कहाँ...अब खबर तो है !

ढल गई शाम भी, अब ठहर जा,
कोई है इंतज़ार में, जा, घर जा।

कभी कभी सुबह ऐसी खूबसूरत होती है,
ना किसी की खबर, ना कोई फ़िकर होती है।

लोग जो दिल के बहोत करीब होतेँ है,
सच में... बड़े ख़तरनाक रकीब होते है।

ज़िन्दगी भी कहाँ अपनी फ़ितरत बदलती है,
सपनों की लहर के बाद सैलाब उगलती है।

- ताइर

Wednesday, January 8, 2014

अन्ना की टपरी - 2

पुणे में गुज़ारे ज़िन्दगी के कुछ यादगार सालों में एक सबसे अहम बात जो हुई वो थी 'अन्ना की टपरी'। ये गाना मेरे अज़ीज़ दोस्त अभय के भेजे की उपज थी और एमआईटी के हर स्टूडंट (?) की पसंद। 

यहाँ सबसे पहले उसी गाने की विडीओ लिंक है और उसके बाद… अन्ना की टपरी -२. 




अन्ना की टपरी -२

अन्ना की टपरी
अब तक ना भूली
लाइफ़ ये चाहे
कितनी भी बदली
एमआईटी छूटा
यार दोस्त बिखरे
किस्मत में रंग नए
फ़िर भी है निखरे

बंदा था तैयार
पूरी तरह से
मात खाये ना 
किसी जगह से 
मार्केट ने कईं 
ठोकर लगाई 
फ़िर भी ना उसने
हार कहीं मानी

अन्ना की टपरी...

घरवालों का भी
नंबर अब आया
शादी का प्रेशर 
खूब लगाया
फ़िर एक लड़की
उसको भी भाई
बंदे ने ख़ुशी ख़ुशी
शादी रचाई 

अन्ना की टपरी...

अब बिलकुल सेटल
लाइफ़ हुई यारों
फ़िर भी तुम मानों
चाहे ना मानों
अब भी वो दिन
याद जब हैं आतें
थोड़ा हसातें 
थोड़ा रुलातें 

अन्ना की टपरी
अब तक ना भूली
लाइफ़ ये चाहे
कितनी भी बदली!

Saturday, December 21, 2013

अब भी...

अब भी तुझसे कोई रिश्ता सा बना है,
हाथ में हाथ नहीं, तू यादों से जुड़ा है। 

ख़त्म करने कि बात तू करना ना मुझसे,
वजूद मेरा सिर्फ तेरे एहसास पे टिका है।  

कोई बात नहीं गर तू वाक़िफ़ नहीं मुझसे,
करता कहाँ कुबूल हर दुआ खुद है !

अब भी अपने आप से घबराते है कितना,
वो हर सुबह पत्थर से करते दुआ है। 

Monday, June 3, 2013

अमन-ओ-सुकूं को आवाज़ लगाते हैं !

आओ चलो हम भी कुछ बवाल मचाते हैं,
अमन--सुकूं को आवाज़ लगाते हैं !

बड़े दिन हो गए कोई हरकत नहीं की,
यारों आज सारी ही कसर मिटाते हैं l 

कल तक जो बोले तो अनसुने रहें,
अब चुपचाप हम दास्ताँ कह जातें हैं 

तेरी इनायत भी क्या खूब बरसती है,
'काफ़िर' कहलाए वो जो सवाल उठाते हैं l
 
'ताइर' की बेफ़िक्री पे शक क्यों है उन्हें,
जो हर बार, सिर्फ ताना दे आते हैं !

Sunday, December 23, 2012

हालात-ए-देश की बात क्या करूँ ?

इस हालात-ए-देश की बात क्या करूँ 
मैं गुस्सा हूँ, शर्मसार हूँ और फ़िर डरूं ?

यहाँ रोज़ होता है मासूमों से खिलवाड़
तबाह कर ज़िंदगियाँ  गुनहगार जिए आज़ाद
जिस 'औरत' को देवी बना के पूजा जाता है
उसी को हवस से सरेआम रौंदा जाता है
संस्कृति और तहज़ीब का दावा होता है
पर आवाज़ जो उठाये उसे कुचला जाता है !

माँ, बहेन, बेटियाँ खॉफ़ का शिकार है 
समाज में फैला ये कैसा विकार है 
केवल बातों और वादों से चल रही सरकार है
उस से कोई उम्मीद भी अब रखना बेकार है l 

कुछ करने का, बदलने का अब जो सबका विचार है 
तो इस आगाज़ को अंजाम तक ज़रूर ले जाएंगे,
या फिर येही मान लें, हम सभी लाचार है l 

Tuesday, December 4, 2012

ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की...

ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की,
होगी जो बात, अब होगी हम सब की l

छोटे छोटे टुकडो में बाँट लेना खुद को,
फितरत-ए-इन्सा देखो चल रही गज़ब की l  

मकसद लापता और राह चले गुमराह,
इबादत भी ऐसी भला किस मतलब की।

है अगर मौजूद वोह हर एक शेय में,
मारते जिसे तुम वो भी औलाद है रब की।

शामिल ना करो तुम उसे रवाज़ो में अपने,
तोड़ चूका 'ताइर' वो दिवार है कब की। 

Thursday, October 4, 2012

'भारतवासी' मर मर के जिया है...


अब उसे किस्तों में क्यों बाँट दिया है
देश को 'बेच खाना' जब तय कर लिया है?

कभी कच्चा तेल कभी ऍफ़डीआई रिटेल 
कभी पानी के नाम पर घोटाला किया है !

सुनेहरे सपनों के झाल में यूँ उलझाया
महंगाई का ज़हर सबने सब्र से पिया है l 

'आम आदमी' की सरकार क्या खूब चली
हर एक 'भारतवासी' मर मर के जिया है l 

Saturday, September 22, 2012

अल्लाह बचाए या राम !

इस तरह हर रोज़, नीलाम हो रहा सरेआम,
वजूद-ए-हिन्दोस्ताँ मिट जाएगा, रहेगा सिर्फ नाम !

जनता आम और ज़िन्दगी कोडियों के दाम,
भ्रष्टाचारी और लाचारी, है सरकार का काम !

एक होने की बात पर, एक एक कर बंट जाए,
खुद का मतलब निकलते ही, हो जाए नियत हराम !

सदियों पुरानी ग़लती बड़े फक्र से दोहराई है,
तक़दीर की है बात अब, अल्लाह बचाए या राम !

Thursday, September 13, 2012

तब तक !

सरकार 'लाचार' हैं
देश को लूटें बगैर चल नहीं सकती
जनता 'बीमार' हैं
बातें करती हैं  पर लड़ नहीं सकती !

सभी देशभक्त है यहाँ पर
खुद का फ़ायदा हो तब तक
सभी ईमानदार है यहाँ पर
किंमत छोटी हो तब तक !

देश की चिंता सबको है
सिर्फ काम ना सूझे तब तक
इज्ज़त सबकी सलामत है
किस्सा ना खुले तब तक !

Wednesday, August 15, 2012

देश यूँ ही चला है, बस यूँ ही चलेगा !

आज फिर एक बार चर्चे होंगे महान इतिहास के
आज फिर रंगो से देशभक्ति ज़ाहिर होगी
आज घर के बड़े, बच्चों को आज़ादी का पाठ देंगे
मीडिया वाले नए 'फ्रीडम फाइटर्स' ढूंढ निकालेंगे !


फिर भगतसिंह-सुखदेव की दास्ताँ कहेंगे
फिर गाँधी के सत्याग्रह की दुहाई आज देंगे
फिर सरदार के संकल्प की मिसाल दोहराएंगे
फिर आज़ाद का वो आज़ाद मिज़ाज दिखाएंगे... 
हर साल की तरह इस साल भी आज़ादी का
सिर्फ चर्चा, दिखावा और व्यापार होगा


कल सब फिर उसी चक्कर में लग जाएंगे
अपनी अपनी हैसियत से 'देशलूट' लगाएंगे
आने वाले साल तक हर देशभक्त सोया रहेगा 
रोज़ाना ख़बर देख के, पढ़ के, सुन के कहेगा 
'यहाँ ना कुछ बदला है, ना कुछ बदलेगा,
ये देश यूँ ही चला है, बस यूँ ही चलेगा !'

Sunday, June 17, 2012

आख़िर हम चलें है किधर?


सुबह सुबह देखो अखबार के पन्ने
गुनाहों का जैसे कोई ग्रन्थ हो
कहीं भ्रष्टाचार कहीं डकैती
कहीं खून तो कहीं बलात्कार
कहीं आतंकी हमला
कहीं युद्ध का डंका
अच्छा कुछ पढने को
नया कुछ सिखने को
नज़र दौड़े भी तो कहाँ तक?

मन में कभी व्यथा तो कभी खौफ़
हावी हो जाते है इसकदर
की सवाल इतना ही होता हैं
आख़िर हम चलें है किधर?
कैसा जहाँ बनाना है हमें
आने वाली पीढ़ी को क्या दे जाना है ?

हो सकता है अखबार से निगाह चुरा लें
निगाह किसी और 'मीडिया' पे लगा लें
बात मगर वहीँ आ जाती है
आख़िर हमारी ये दुनिया
किस जानिब चले जाती है
हम उसे चलाते हैं
या लालच बहकाती है?
बेहतर कल की तो बातें है सारी
नहीं बची हम में खुद्दारी
धरती रहेगी जहाँ की तहाँ शायद
ले डूबेगी हमें खुदगर्ज़ी हमारी !

Sunday, March 4, 2012

वोही सुकून नहीं है

एक बिल्डिंग से निकल कर
वेहिकल पे थोड़ी दूर चल कर
एक बड़ी सी बिल्डिंग में
घूस जाते है शौपिंग के बहाने
या मूवी का लुत्फ़ उठाने
और कुछ भी न सूझे तो खाना दबाने!
वैसे तो कट जाता है
पर सोचो तो शहर का जीवन
बहोत ही लगता है पकाने!

पूरा हफ्ता कमाई में गुज़रे
और वीकेंड फ़िज़ूल खर्ची करने में
हर बार फिर भी वो ही सवाल
'इस बार कहाँ जाए', दिल बहलाने?
यूँ ही बेमतलब गुज़रती चलती है
ज़िन्दगी हर रोज़ आहें भारती है ।

थोड़ी सी आज़ादी इन मकानी जंगलों से,
थोडा सा सुकून चाहिये
जो ना मिले इंसानी दंगलों से ।
बेसबब इधर उधर भटकते रहना
पूछे कोई हाल तो 'कट रही है' कहना
इसी में उम्र तमाम हो रही हैं,
लेकिन मन को जो चाहिए
वो सुकून नहीं है,
वोही सुकून नहीं है ।

Wednesday, January 25, 2012

ऐसा भी नहीं...

ऐसा भी नहीं की हमनें अब तक कुछ किया नहीं,
पर बात ये भी है, जीना चाहिए जैसे, जिया नहीं


कभी दर्द कभी तनहाई कभी जश्न के बहाने पीया,
पर ढूंढते रहे जिसको वो सुकून में ही पीया नहीं।

कहने को तो जहाँ से किसी बात की कमी नहीं,
दिल ने क्या कर ली उंस की ख्वाहिश, दिया नहीं।

शुक्र कर खुदा 'ताइर' को कोई ऐतबार नहीं है तेरा,
इस सबब-ए-हाल खुद को माना, नाम तेरा लिया नहीं।