Friday, April 7, 2017

Our obsession with politics

We are a nation highly obsessed with politics. Politics is what we eat, drink and breathe. It runs into our blood. People of our great nation turn to news channels for entertainment more than the real news. Checkout the shows!!! Starting from government forming to decision making at home, everything is filled with politics. We rarely think of something as 'for all'. Most of our thoughts are based upon what is there for me?

Yes, it's human nature to think and behave for self benefit. But to become a great nation, we must rise above this. The people of great nations on this planet have taught us that, time and again.

We are a nation surprisingly sentimental about things that matter less on a larger prospective. We care about Bollywood and Cricket much more than our neighbors. We worry about celebrities more than our near and dear ones.

We are unable to unite for one single cause. We are not only unable to rise above religion and castes, but have been diving deep into that well which divides us as a nation. Reservation has been used as a political tool to fool people and earn votes. 

Pollution, corruption, education, healthcare, infrastructure, employment, etc. are those of many issues which we must be discussing and asking questions about, but we are not. Yes we do discuss them now and then, but they haven't been our main tools for judging a government.


Something is wrong with us, right from the beginning and that may be our upbringing, education or mixture of all, but we are on the verge of failing as a society for sure. What is wrong and what is right is always debatable but only thing I am sure is, if it doesn't fall into the 'nation first' agenda, it's not right.

Sunday, April 2, 2017

बच्चे, पेरेंट्स और गैजेट्स

हम उस दौर में जी रहें हैं जहाँ टेक्नोलॉजीने हमारी ज़िन्दगी जितनी आसान कर दी है उतनी ही लाचार भी हैं। हम चीजों को आसान बनाने के चक्कर में शायद इतने उलझ गए की रुकना कहाँ है शायद हम समझ नहीं पा रहे।  और एक आम इंसान पर इसका फायदा जो हुआ है उतना ही नुकसान।

मेरे हम उम्र लोग इस बात  से बिलकुल तालुक रखेंगे की जो स्मार्टफोन उनके लिए दुनिया से जुड़े रहने का जरिया है, वहीँ उनके बच्चों के लिए खिलौना! बच्चे मैदान कम मोबाईल पर ज़्यादा होते हैं। बहोतों बार मैं देखा है की माता-पिता अपने बच्चों को मोबाईल ऑपरेट करते हुए देख एक गर्व सा महसूस करतें हैं। नहीं होनी चाहिए लेकिन मुझे थोड़ी तकलीफ ज़रूर होती हैं। जिस उम्र में बच्चें खेलने कूदने चाहिए, जिस से की उनका शारीरिक विकास ठीक से हो उस उम्र में गैजेट्स से उनको अपाहिज बनाने तक का काम हो रहा है  और वो भी गर्व से।  

और फिर पेरेंट्स की फ़रियाद भी होती हैं की बच्चा या तो मोबाईल से खेलता रहता हैं या टीवी देखता रहता हैं।  
मैं उन पेरेंट्स से पूछना चाहता हूँ की आखिर ये हुआ कैसे? क्या आपने कभी सोचा की बच्चा आपने जो किया वो ही कर रहा है और ना की जो कहा। बचपनमें हम देख कर सीखते है, सुन कर नहीं।  

बच्चे को जब आपका वक्त चाहिए तब आप खुद व्हाट्सएप्प या फेसबुक लेके बैठे रहते हैं। उसके सवालों का जवाब देने का वक़्त ही कहाँ था आपके पास।  आप उसके फोटो और विडियो पे वाहवाही कमाने बैठे थे।  बच्चा कुछ कर रहा है कैमरे की नहीं अपनी आँखों से देखो, उसे अच्छा महसूस होगया और होगा।  वरना बच्चा धीरे धीरे वही सारी चीज़ें सीखता रहा। मैं कुछ ऐसे पेरेंट्स को भी जानता हूँ जिन्होंने २-३ साल के बच्चे की प्रोफ़ाइल भी फेसबुक पे बना रक्खी हैं।  अरे, आखिर ज़रूरत क्या है? आपकी प्रोफ़ाइल ही काफ़ी नहीं क्या? उसका वक्त आने पे बच्चा भी बना ही लेगा ना। 

बच्चे को दुनिया में लाने वाले आप है।  उसे आपका वक़्त और प्यार चाहिए ना की लोगों की आपके सोशल मीडिया प्रोफाइल पे वाहवाही।  गैजेट्स को कमज़ोरी नहीं, ताकत बनाओ।  आदत नहीं, ज़रिया बनाओ।  या फिर उस दिन के लिए तैयार रहो जिस दिन बच्चा अपने ही घर में आप से व्हाट्सएप्प या स्नैपचैट से बात करेगा और आप पछताने के सिवा कुछ नहीं कर पाओगे।  

Sunday, November 13, 2016

ऐसी कतारें...

करेंसी बैन ने जीवन परिवर्तन कर दिया। २ दिन से जहाँ देखो वहाँ बस कतारें ही नज़र आ रही है। यह स्थिति किसी के लिए बड़ी दर्द दायीं है तो कोई इस हाल का लुत्फ़ उठा रहा है। मैंने अपनी समझ के हिसाब से इसे शब्द देने की कोशीश की...



लगी है ऐसी कतारें
बैंक और डाक खानों पर
सन्नाटा चींख रहा है
बाज़ार में खुली दुकानों पर।

A picture that speaks everything
शादी ब्याह का माहोल हो
या घर में कोई बीमारी
हाथ में लिए पैसा भी
सब पाते हैं लाचारी !

कुछ अपनी नोटों से, कुछ दूसरे हवालों से
परेशान सबका हाल है
पेहली बार कम या छोटी नोट वाला
लगता ज़्यादा खुशहाल है।

अफ़रातफ़री के माहोल में भी
कुछ तो अच्छी सीख है जो लो
बस नॉट नहीं लोग भी कमाओ
कागज़ से ही ना सब तोलो।

- ताइर