17 June 2008

ज़रुर कोई तक़दीर का मारा होगा...

ज़रुर कोई तकदीर का मारा होगा वो,
वरना रात को सड़क पे kयों आवारा होगा वो?

शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबते आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।

और फिर सुबह से पूजा करता है सूरज की,
पूनम तक चाँद का ना दुबारा होगा वो।

बचपन जो पुरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!

फिजूल की उम्मीद 'ताइर' लगा बैठा उस से,
ख़ुद का ना हो सका, क्या हमारा होगा वो ?

10 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

एक एक शेर बिना सीढ़ी के दिल में उतर गया.. ला जवाब ग़ज़ल.. वाकई.. और हा एक सुझाव भी है.. लिखना बंद मत करिएगा.. वरना हमारा क्या होगा..

नीरज गोस्वामी said...

बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने...बधाई.
नीरज

रंजू ranju said...

बचपन जो पूरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!

बहुत खूब लिखा है आपने ..अच्छा लगा इसको पढ़ना

ajinkya said...

my modern galib, maze to hai aap ki likhae me

DR.ANURAG said...

शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबता आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।

vah vah......taeer

Udan Tashtari said...

बचपन जो पूरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!


--बहुत बढ़िया.

manishi... said...

बीच मझधार में तरसता है मन जिसके लिए
सोचो.... क्या खूब किनारा होगा वो...

उम्दा ग़ज़ल.. एक से बढ़कर एक शेर..
उर्दू हमें हमेशा से बड़ी नफ़ासत वाली भाषा लगती है! लिखते रहें और यूँ ही हमें पढ़ने का मौका देते रहें!!

Saee_K said...

bahut yaane bahut hi badhiya ghazal..har ek sher ek se badhkar ek likha hai aapne..

बचपन जो पुरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!

फिजूल की उम्मीद 'ताइर' लगा बैठा उस से,
ख़ुद का ना हो सका, क्या हमारा होगा वो ?

yeh..to dil mei utar gaye maano..

likhte rahe

seema gupta said...

शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबते आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।
"very touching"

Advocate Rashmi saurana said...

bhut bhavuk rachana. sundar.