ज़रुर कोई तकदीर का मारा होगा वो,
वरना रात को सड़क पे kयों आवारा होगा वो?
शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबते आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।
और फिर सुबह से पूजा करता है सूरज की,
पूनम तक चाँद का ना दुबारा होगा वो।
बचपन जो पुरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!
फिजूल की उम्मीद 'ताइर' लगा बैठा उस से,
ख़ुद का ना हो सका, क्या हमारा होगा वो ?
डर: एक माईक्रो कथा
1 day ago

10 comments:
एक एक शेर बिना सीढ़ी के दिल में उतर गया.. ला जवाब ग़ज़ल.. वाकई.. और हा एक सुझाव भी है.. लिखना बंद मत करिएगा.. वरना हमारा क्या होगा..
बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने...बधाई.
नीरज
बचपन जो पूरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!
बहुत खूब लिखा है आपने ..अच्छा लगा इसको पढ़ना
my modern galib, maze to hai aap ki likhae me
शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबता आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।
vah vah......taeer
बचपन जो पूरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!
--बहुत बढ़िया.
बीच मझधार में तरसता है मन जिसके लिए
सोचो.... क्या खूब किनारा होगा वो...
उम्दा ग़ज़ल.. एक से बढ़कर एक शेर..
उर्दू हमें हमेशा से बड़ी नफ़ासत वाली भाषा लगती है! लिखते रहें और यूँ ही हमें पढ़ने का मौका देते रहें!!
bahut yaane bahut hi badhiya ghazal..har ek sher ek se badhkar ek likha hai aapne..
बचपन जो पुरा हाथ फैला कर बीते,
कभी तो सोचो कितना बेचारा होगा वो!
फिजूल की उम्मीद 'ताइर' लगा बैठा उस से,
ख़ुद का ना हो सका, क्या हमारा होगा वो ?
yeh..to dil mei utar gaye maano..
likhte rahe
शाम से ही चाँद की राह तकता रहे मगर,
डूबते आफ़ताब का ना सहारा होगा वो।
"very touching"
bhut bhavuk rachana. sundar.
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