25 June 2008

कितने ही राज़...

कितने ही राज़ खोल देती दिल के,
आँखे उनकी आँखों से मिल के।

देख उन्हें ज़बान साथ छोड़ देती,
और ये होठ रह जाते सिल के।

मुस्कान जो बिखेर जाए वो हम से,
महकते गुल-ए-अरमान खिल के।

छा जाए जब वो शमा बन कर,
कर दे रोशन लम्हें मेहफिल के।

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

15 comments:

रंजू ranju said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

बहुत खूब कहा इस में आपने ...

DR.ANURAG said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

bahut badhiya........kya bat hai...

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

क्या शेर मारा है ताईर मिया.. रदीफ़ कमाल का पकड़ा है आपने..

swati said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
bahut sundar
anubhuti se bhara

Neela Assman said...

Its a soft-soft creation!!
Andaz khoob hey!

Advocate Rashmi saurana said...

sundar rachana ke liye badhai.

mehek said...

देख उन्हें ज़बान साथ छोड़ देती,
और ये होठ रह जाते सिल के।

मुस्कान जो बिखेर जाए वो हम से,
महकते गुल-ए-अरमान खिल के।

छा जाए जब वो शमा बन कर,
कर दे रोशन लम्हें मेहफिल के।
wah wah bahut hi sundar badhai

nav pravah said...

बहुत ही लाजवाब लिखा भाई हाँ.खुदा बरकत दे आपकी कलम को और साथ ही दे ढेर सारे गम ताकि कुछ और दर्द भरे शेर हमतक आ सकें.वो ग़ालिब साहब ने कहा है न...
दर्द को दिल में दे जगह,इल्म से शायरी नहीं होती.
अब क्या कहूँ?बहुत कह दिया.मस्त लिखा है
आलोक सिंह "साहिल"

श्रद्धा जैन said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

ye sher jayada pasand aaya taeer ji

Udan Tashtari said...

कितने ही राज़ खोल देती दिल के,
आँखे उनकी आँखों से मिल के।


--बहुत खूब..उम्दा!!

Rajesh Roshan said...

पहली दो और अन्तिम दो पंक्तिया बड़ी ही खुबसूरत है... सुंदर रचना

अल्पना वर्मा said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।


--bahut khuub!!!hota hai! aksar aisa hi hota hai!

महामंत्री-तस्लीम said...

"उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।"
बहुत प्यारा शेर है, बधाई स्वीकारें।

Saee_K said...

उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।

bahhut hi khoobsoorat sher..

likhte rahe..

manishi... said...

shuru se aakhir tak padhte hue ye hee laga maano 'kisi' ke saamne baithe hue they aap jab ye likha!
apne andar ki udhed bun ko kuch aisa hee sanche mein dhala hai..
bahut khoob...