कितने ही राज़ खोल देती दिल के,
आँखे उनकी आँखों से मिल के।
देख उन्हें ज़बान साथ छोड़ देती,
और ये होठ रह जाते सिल के।
मुस्कान जो बिखेर जाए वो हम से,
महकते गुल-ए-अरमान खिल के।
छा जाए जब वो शमा बन कर,
कर दे रोशन लम्हें मेहफिल के।
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
डर: एक माईक्रो कथा
1 day ago

15 comments:
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
बहुत खूब कहा इस में आपने ...
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
bahut badhiya........kya bat hai...
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
क्या शेर मारा है ताईर मिया.. रदीफ़ कमाल का पकड़ा है आपने..
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
bahut sundar
anubhuti se bhara
Its a soft-soft creation!!
Andaz khoob hey!
sundar rachana ke liye badhai.
देख उन्हें ज़बान साथ छोड़ देती,
और ये होठ रह जाते सिल के।
मुस्कान जो बिखेर जाए वो हम से,
महकते गुल-ए-अरमान खिल के।
छा जाए जब वो शमा बन कर,
कर दे रोशन लम्हें मेहफिल के।
wah wah bahut hi sundar badhai
बहुत ही लाजवाब लिखा भाई हाँ.खुदा बरकत दे आपकी कलम को और साथ ही दे ढेर सारे गम ताकि कुछ और दर्द भरे शेर हमतक आ सकें.वो ग़ालिब साहब ने कहा है न...
दर्द को दिल में दे जगह,इल्म से शायरी नहीं होती.
अब क्या कहूँ?बहुत कह दिया.मस्त लिखा है
आलोक सिंह "साहिल"
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
ye sher jayada pasand aaya taeer ji
कितने ही राज़ खोल देती दिल के,
आँखे उनकी आँखों से मिल के।
--बहुत खूब..उम्दा!!
पहली दो और अन्तिम दो पंक्तिया बड़ी ही खुबसूरत है... सुंदर रचना
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
--bahut khuub!!!hota hai! aksar aisa hi hota hai!
"उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।"
बहुत प्यारा शेर है, बधाई स्वीकारें।
उतना ही दूर जैसे हो गया 'ताइर',
पहुँचा जितना करीब मंजिल के।
bahhut hi khoobsoorat sher..
likhte rahe..
shuru se aakhir tak padhte hue ye hee laga maano 'kisi' ke saamne baithe hue they aap jab ye likha!
apne andar ki udhed bun ko kuch aisa hee sanche mein dhala hai..
bahut khoob...
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