12 December 2008

दिन ढलते ढलते...

काफ़ी समय के बाद कुछ रोमानी अंदाज़ की ग़ज़ल लिखी हैं...

दिन ढलते ढलते याद आया तो होगा,
तुम्हे मेरा ख़याल सताया तो होगा!

बेअसर ना गुजरी होगी रात तन्हाई की,
नींद ने भी ख्वाब, दिखाया तो होगा!

फिर सुबह आईने में देख ख़ुद को,
मुझे भी निगाह में पाया तो होगा!

तसव्वुर जब हर पहर सताने लगे,
बेकरार दिल को भी समजाया तो होगा!

'ताइर' के फन का भी जवाब नहीं कोई,
जागते हुए सपना ये सजाया तो होगा!

11 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत उम्दा गजल है।बधाई।

"अर्श" said...

ghazal ke makte se hi pata chalta hai ke kis darje rumani hai aapke bhitar.. bahot hi umda ghazal likhi hai apane bahot sundar dhero badhai aapke liye taair bhai ....


arsh

विवेक सिंह said...

उम्दा , बेहतरीन गज़ल साधुवाद स्वीकारें !

डॉ .अनुराग said...

बेअसर न गुजरी होगी रात ..क्या बात कही दोस्त !
....अब तो हमें भी ऐसा लगा जैसे एक वक़्त गुजरा रूमानी गजल तुम्हारे पास से पढ़े या कुछ रूमानी सा लिखे ..

गौतम राजरिशी said...

कहाँ थे ताइर भाई इतने दिनों से?

mehek said...

bahut dilkash andaaz bahut hi sundar

नीरज गोस्वामी said...

बेहतरीन ग़ज़ल जनाब...लिखते रहिये...
नीरज

Shashwat Shekhar said...

"फ़िर सुबह आईने में देख ख़ुद को, मुझे भी निगाह में पाया तो होगा"
खुबसूरत है

कुश said...

धारधार ग़ज़ल है ताईर मिया..

seema gupta said...

बेहतरीन ग़ज़ल
Regards

अनुपम अग्रवाल said...

रात तो कटी जिस तरह कटी लेकिन
सुबह आईने को कैसे समझाया होगा ?