20 August 2008

'ग़ज़ल'

काफ़ी विषयों पर काफ़ी कुछ लिखते हैं हम...पर उसी चीज़ पर बहोत कम लिखा गया हैं जो सहारा बनती हैं जज्बातों को लफ्ज़ देने के लिए... कभी इसी सोच से लिखी थी एक 'ग़ज़ल'... आज दोहराने का मन किया हैं...


दिल में दबे जज़्बात लिख दूँ तो बने ग़ज़ल,
तन्हाई में मेरे साथ गुफ्तेगु करे ग़ज़ल।

नासमजी थी अपनी, रोग-ए-इश्क लगा लिया,
बिखरी सी धड़कन में होंसला भरे ग़ज़ल।

हिसाब-ए-जहाँ से जब मेहरूम हूँ जिया,
हर मकाम-ए-सफर मेरे संग चले ग़ज़ल।

निगाहें अश्क बिन जब प्यासी रह जाए तो ,
सहारा ले लफ्जों का, ज़ार ज़ार बहे ग़ज़ल।

अब पूछो ना 'ताइर' से क्यों लिखता है वो ?
समझ पाता कोई तो हम ना कहते ग़ज़ल।

10 comments:

पोस्टमैन said...

समज पाता कोई तो हम ना कहते ग़ज़ल।

kya baat hai taaer miya.. aap to gazal king bante ja rahe hai..

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

अच्छा लगा आपकी ग़ज़ल पढ़कर!

अनुराग said...

निगाहें अश्क बिन जब प्यासी रह जाए तो ,
सहारा ले लफ्जों का, ज़ार ज़ार बहे ग़ज़ल।

अब पूछो ना 'ताइर' से क्यों लिखता है वो ?
समज पाता कोई तो हम ना कहते ग़ज़ल।

bahut khoob ....aakhiri sher itna badhiya hai....isme samjh ki spelling theek kar do......

'ताइर' said...

ji sir ji...lo kar di thik...

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा,बधाई.

seema gupta said...

निगाहें अश्क बिन जब प्यासी रह जाए तो ,
सहारा ले लफ्जों का, ज़ार ज़ार बहे ग़ज़ल।

""ख़ुद को बहलाने का सबब न मिले
दिल-ऐ-नादाँ का सहारा बने ग़ज़ल"
Regards

सतीश सक्सेना said...

अरे वाह ! वाकई में क्या खूब है ग़ज़ल !

श्रद्धा जैन said...

निगाहें अश्क बिन जब प्यासी रह जाए तो ,
सहारा ले लफ्जों का, ज़ार ज़ार बहे ग़ज़ल।

अब पूछो ना 'ताइर' से क्यों लिखता है वो ?
समझ पाता कोई तो हम ना कहते ग़ज़ल।

bhaut bhaut pasand aaye gazal ke sare hi sher

kmuskan said...

bahut khub.......

रज़िया "राज़" said...

वो तो ख़ुद प्यास है फ़िर भी वो आस है।

प्यासी धरती पे मानो वो बरसात है।

अपनी बुंदोँ से शीद्दत बुज़ाती गज़ल।
पूरी गज़ल पढने यहाँ आइए जनाब।
http://razia786.wordpress.com