बड़े दिनों से अलग अलग ब्लॉग पर पढ़ रहा हूँ... नारी स्वातंत्र्य और नारी सशक्तिकरण के बारे में... लेकिन कभी इस चर्चा में शामिल नहीं हुआ था ये ही सोचते हुए की ... sometimes, no reaction is the best reaction... और वैसे भी इतने ज़्यादा लोग इस विषय पर लिख ही तो रहे हैं...की मेरे लिखने ना लिखने से फर्क ही नही पड़ता...
लेकिन आज लिखना ज़रूरी लग रहा हैं...एक साहब का ऑरकुट पर अपना ब्लॉग पढने के लिए संदेश आया...और पढ़ ली उनकी पोस्ट...और हो गया दिमाग ख़राब...
क्या है ये सब...जिसे देखो वो ' नारी सशक्तिकरण' और 'नारी स्वातंत्र्य' का झंडा लिए घूम रहा है अपने ब्लॉग पर...ऐसा लग रहा हैं जैसे इन्टरनेट की दुनिया में ब्लॉग के रास्ते रैली निकाली है सबने...
मैं कुछ चीजों पर ध्यान दोहराना चाहता हूँ... मेरे विचारो से किसी की सहमति नही चाहता ... बस अपने विचार लिख रहा हूँ...
सबसे पहली और अहेम बात तो ये ही है की ये जो लोग लिखे जा रहे है नारी उत्कर्ष के लिए... वोही सबसे बड़े दुश्मन बन रहे है नारी के...क्यों की पहले तो वो लोग बेवजह ही स्त्री - पुरूष भेदभाव फैलाते हैं... और बाद में विचार हीनता का इल्जाम किसी और पे ठोकते हैं... हाँ, मानता हूँ की 'मेल-फिमेल केमिस्ट्री' दुनिया की शुरुआत से थी और रहेगी आख़िर तक...लेकिन उसका एक अलग वजूद है और कशिश भी हैं... पर हर चीज़ को और हर विषय को केवल स्त्री-पुरूष के भेदभाव तक ले जाना या हर कहीं केवल वो ही देखना एक कमजोरी है...एक मानसिक बीमारी हैं...
दूसरी बात ये है की आप जब ऐसा लिखते हो 'नारी स्वातंत्र्य' उसका मतलब ही आप ये मानते हो की नारी गुलाम हैं...अरे ऐसे ख़यालात फैलाने की क्या ज़रूरत हैं? कौन कहता है की नारी गुलाम हैं? ये लिखने वाले लोगो के मन की उपज हैं... कईं बार तो ऐसा लगता हैं की उनको बस स्त्री-पुरूष भेदभाव भड़काना है और मज़ा लेना हैं...
हाँ...मैं ये ज़रूर मानता हूँ की अपने देश में काफ़ी जगाओ पर स्त्रियों के साथ ग़लत व्यवहार होता हैं...पर क्या ये केवल उन तक सिमित हैं? कभी इन चीज़ों से ऊपर उठ कर देखो तो ये हर जगह किसी न किसी रूप में फैला हैं... कभी बच्चो के साथ शिक्षक की और से तो कभी खूब कहलानेवाले 'संत' की और से... कभी संस्कार और परम्परा के नाम पर माता-पिता की और से बच्चो की बलि चढ़ती हैं... तो कभी माडर्न होने के नाम पर बच्चे माँ-बाप को घर से निकाल देते हैं... काफ़ी समस्याएं हैं...
फ़िर भी हर बार केवल नार नारी और नारी की बिन बजाने वाले लोगो को शायद और कुछ नज़र ही नही आता... और मान भी ले उनको सच में इतनी फिक्र हैं तो ज़रा वो ख़ुद अपने ज़हन में झान्खे और ख़ुद से पूछे की किसी पीड़ित नारी की मदद करने के लिए उन्होंने ब्लॉग पर पोस्ट लिखने और कमेंट्स लेने के अलावा क्या किया? क्या कभी किसी को कहीं से छुडाने की कोशिश की? क्या कभी किसी को अपनी शक्ति के हिसाब से आर्थिक मदद की?
मैं यकीं के साथ कहता हूँ की नारी स्वातंत्र्य के आधे से ज़्यादा योद्धा इसका जवाब देने से कतरायेंगे...
(ये लेख किसी पर व्यक्तिगत रूप से नही लिखा गया हैं...)
डर: एक माईक्रो कथा
1 day ago

6 comments:
इस बारे में वैज्ञानिक तथ्य आप यहाँ देख सकते हैं: gendifhindi.blogspot.com
ओर भी गम है जमाने में ......मुहब्बत के सिवा ..
जो उठाते है तकरीरे उन्हें उठाने दो.....इन रास्तो से मेरे दोस्त तुम्हे बस गुजर जाना है.....
आपका चिंतित होना स्वाभाविक है.. आपने कम से कम अपनी सोच तो रखी है... वरना कुछ लोग ये भी नही करते..
मेरी शुभकामनाए आपके साथ है..
ताईर भाई, शायद जरुरत पडे यह सोच, मित्रवत शुभकामनाऐं देने आया था बस!!
haan sach kaha hai..bilkul sach...koi do rai nahi isme.
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