Monday, June 6, 2016

मेरी पसंद के चंद शेर

वो जो मेरी नाकामी की दुआएँ माँगते थे,
सुना है अब खुदा पे ही यकीन नहीं रखते!

इतनी खुराफ़ाती भी अच्छी नहीं है दिल,
लोग बुरा मान जातें है, बेपर्दा जो मिल।

मुनासिब कहाँ की सरेआम, हम ले नाम,
दोस्तों का काम था, सो कर गए तमाम!

थोड़ा 'हरामीपन' भी ज़रूरी है,
साफ़ दिल, दुनिया समझे मज़बूरी है!

रिश्तों में बदलाव आना लाज़मी था,
अब मैं उसी के रुख़ का आदमी था।

कुछ अधूरे ख्वाब यूँ भी बर आते हैं,
जब निगाह बंध हो, साफ नज़र आते हैं।

माना धुंधला है रास्ता पर नज़र तो है,
पहुँचना है कहाँ...अब खबर तो है !

ढल गई शाम भी, अब ठहर जा,
कोई है इंतज़ार में, जा, घर जा।

कभी कभी सुबह ऐसी खूबसूरत होती है,
ना किसी की खबर, ना कोई फ़िकर होती है।

लोग जो दिल के बहोत करीब होतेँ है,
सच में... बड़े ख़तरनाक रकीब होते है।

ज़िन्दगी भी कहाँ अपनी फ़ितरत बदलती है,
सपनों की लहर के बाद सैलाब उगलती है।

- ताइर

Wednesday, January 8, 2014

अन्ना की टपरी - 2

पुणे में गुज़ारे ज़िन्दगी के कुछ यादगार सालों में एक सबसे अहम बात जो हुई वो थी 'अन्ना की टपरी'। ये गाना मेरे अज़ीज़ दोस्त अभय के भेजे की उपज थी और एमआईटी के हर स्टूडंट (?) की पसंद। 

यहाँ सबसे पहले उसी गाने की विडीओ लिंक है और उसके बाद… अन्ना की टपरी -२. 




अन्ना की टपरी -२

अन्ना की टपरी
अब तक ना भूली
लाइफ़ ये चाहे
कितनी भी बदली
एमआईटी छूटा
यार दोस्त बिखरे
किस्मत में रंग नए
फ़िर भी है निखरे

बंदा था तैयार
पूरी तरह से
मात खाये ना 
किसी जगह से 
मार्केट ने कईं 
ठोकर लगाई 
फ़िर भी ना उसने
हार कहीं मानी

अन्ना की टपरी...

घरवालों का भी
नंबर अब आया
शादी का प्रेशर 
खूब लगाया
फ़िर एक लड़की
उसको भी भाई
बंदे ने ख़ुशी ख़ुशी
शादी रचाई 

अन्ना की टपरी...

अब बिलकुल सेटल
लाइफ़ हुई यारों
फ़िर भी तुम मानों
चाहे ना मानों
अब भी वो दिन
याद जब हैं आतें
थोड़ा हसातें 
थोड़ा रुलातें 

अन्ना की टपरी
अब तक ना भूली
लाइफ़ ये चाहे
कितनी भी बदली!

Saturday, December 21, 2013

अब भी...

अब भी तुझसे कोई रिश्ता सा बना है,
हाथ में हाथ नहीं, तू यादों से जुड़ा है। 

ख़त्म करने कि बात तू करना ना मुझसे,
वजूद मेरा सिर्फ तेरे एहसास पे टिका है।  

कोई बात नहीं गर तू वाक़िफ़ नहीं मुझसे,
करता कहाँ कुबूल हर दुआ खुद है !

अब भी अपने आप से घबराते है कितना,
वो हर सुबह पत्थर से करते दुआ है।