Monday, June 3, 2013

अमन-ओ-सुकूं को आवाज़ लगाते हैं !

आओ चलो हम भी कुछ बवाल मचाते हैं,
अमन-ओ-सुकूं को आवाज़ लगाते हैं !

बड़े दिन हो गए कोई हरकत नहीं की,
यारों आज सारी ही कसर मिटाते हैं l 

कल तक जो बोले तो अनसुने रहें,
अब चुपचाप हम दास्ताँ कह जातें हैं l 

तेरी इनायत भी क्या खूब बरसती है,
'काफ़िर' कहलाए वो जो सवाल उठाते हैं l
 
'ताइर' की बेफ़िक्री पे शक क्यों है उन्हें,
जो हर बार, सिर्फ ताना दे आते हैं !

Sunday, December 23, 2012

हालात-ए-देश की बात क्या करूँ ?

इस हालात-ए-देश की बात क्या करूँ 
मैं गुस्सा हूँ, शर्मसार हूँ और फ़िर डरूं ?

यहाँ रोज़ होता है मासूमों से खिलवाड़
तबाह कर ज़िंदगियाँ  गुनहगार जिए आज़ाद
जिस 'औरत' को देवी बना के पूजा जाता है
उसी को हवस से सरेआम रौंदा जाता है
संस्कृति और तहज़ीब का दावा होता है
पर आवाज़ जो उठाये उसे कुचला जाता है !

माँ, बहेन, बेटियाँ खॉफ़ का शिकार है 
समाज में फैला ये कैसा विकार है 
केवल बातों और वादों से चल रही सरकार है
उस से कोई उम्मीद भी अब रखना बेकार है l 

कुछ करने का, बदलने का अब जो सबका विचार है 
तो इस आगाज़ को अंजाम तक ज़रूर ले जाएंगे,
या फिर येही मान लें, हम सभी लाचार है l 

Tuesday, December 4, 2012

ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की...

ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की,
होगी जो बात, अब होगी हम सब की l

छोटे छोटे टुकडो में बाँट लेना खुद को,
फितरत-ए-इन्सा देखो चल रही गज़ब की l  

मकसद लापता और राह चले गुमराह,
इबादत भी ऐसी भला किस मतलब की।

है अगर मौजूद वोह हर एक शेय में,
मारते जिसे तुम वो भी औलाद है रब की।

शामिल ना करो तुम उसे रवाज़ो में अपने,
तोड़ चूका 'ताइर' वो दिवार है कब की।