Sunday, March 4, 2012

वोही सुकून नहीं है

एक बिल्डिंग से निकल कर
वेहिकल पे थोड़ी दूर चल कर
एक बड़ी सी बिल्डिंग में
घूस जाते है शौपिंग के बहाने
या मूवी का लुत्फ़ उठाने
और कुछ भी न सूझे तो खाना दबाने!
वैसे तो कट जाता है
पर सोचो तो शहर का जीवन
बहोत ही लगता है पकाने!

पूरा हफ्ता कमाई में गुज़रे
और वीकेंड फ़िज़ूल खर्ची करने में
हर बार फिर भी वो ही सवाल
'इस बार कहाँ जाए', दिल बहलाने?
यूँ ही बेमतलब गुज़रती चलती है
ज़िन्दगी हर रोज़ आहें भारती है ।

थोड़ी सी आज़ादी इन मकानी जंगलों से,
थोडा सा सुकून चाहिये
जो ना मिले इंसानी दंगलों से ।
बेसबब इधर उधर भटकते रहना
पूछे कोई हाल तो 'कट रही है' कहना
इसी में उम्र तमाम हो रही हैं,
लेकिन मन को जो चाहिए
वो सुकून नहीं है,
वोही सुकून नहीं है ।

Wednesday, January 25, 2012

ऐसा भी नहीं...

ऐसा भी नहीं की हमनें अब तक कुछ किया नहीं,
पर बात ये भी है, जीना चाहिए जैसे, जिया नहीं


कभी दर्द कभी तनहाई कभी जश्न के बहाने पीया,
पर ढूंढते रहे जिसको वो सुकून में ही पीया नहीं।

कहने को तो जहाँ से किसी बात की कमी नहीं,
दिल ने क्या कर ली उंस की ख्वाहिश, दिया नहीं।

शुक्र कर खुदा 'ताइर' को कोई ऐतबार नहीं है तेरा,
इस सबब-ए-हाल खुद को माना, नाम तेरा लिया नहीं।

Wednesday, November 17, 2010

इस सच को सच मानूँ कैसे?

अक्सर यूँ होता है ज़िन्दगी में की हम जिनके साथ रहना चाहते हो उनसे दूर होना पड़ता है l सफ़र चलता रहता हैं, लोग मिलते रहते हैं और बिछड़ते रहते हैं l वैसे तो आज कल 'सोसिअल नेटवर्किंग' और मोबाइल ने इन टच रहना बड़ा आसन कर दिया है...फिर भी साथ बने रहने का मज़ा अलग ही होता हैं l
पर कभी कभी ऐसा भी होता है की हम किसी के साथ रह कर भी साथ नहीं होते l हमारी लाख कोशिशों के बावजूद रिश्ता अपना वजूद कहीं खो देता है l एक तकल्लुफ का दुआर जैसे बना रहता है और फिर धीरे धीरे ख़ामोशी अपनी जगह बना लेती हैं...हम जान कर भी उस सच को मान नहीं पाते और ना अपना कर भी जिस को ठुकरा नहीं पाते !

तुम ही कहो, इस सच को सच मानूँ कैसे,
साथ है मगर दूर, मैं रहूँ कैसे ?

लगातार रिश्ता तोड़ने की कोशिश हैं तेरी,
तेरी जीत की दुआ भला माँगू कैसे ?

कभी कोई बात खुल कर भी करो ना,
बिना इज़हार दबे जज़्बात समझूँ कैसे?

क्यों ना एक मौका मोहब्बत को दे हम,
बिना लड़े ही हथियार, छोड़ दूँ कैसे ?!