दिल अपनी कशमकश ख़ुद ही ना जाने,
यूँ ही अपनें आप से हम हुए बेगाने।
ना सजती हैं हसींना बहते हैं आंसू अब,
हो क्या इलाज जब वजूद लगे ठुकराने?
दुनिया की परवाह नहीं बस तेरा है ग़म,
बिच सफर साथ छोड़ क्यों बने अंजाने ?
क्या दिल को ख्वाहिश का भी हक नहीं कोई?
या कहो शिकायत के बस मिल गए बहाने!
चेहरे पे चेहरा लगा कर जीते हैं जो,
आ गए आज हमें जीने का ढंग सिखाने!
कौन बदला है यहाँ जो बदलेगा 'ताइर'
तरीका-ए-ज़िन्दगी सब आज़ाद हैं अपनाने।

14 comments:
बहुत सुंदर....बधाई।
मान गये आपको,वाह!
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http://prajapativinay.blogspot.com/
"दुनिया की परवाह नही, बस तेरा गम है...."
" नाजुक एहसासों की सुंदर अभिव्यक्ति....और यही एक गम क्या कम है"
Regards
अच्छा लिखा है।
बहुत सही लिखा है...दिल को छु गई.....ऐसे हे आप लिखते रहे ....अच्छा लिखा है।
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कौन बदला है यहाँ जो बदलेगा ........वाह दोस्त क्या बात कही है
क्या बात है ताइर भाई....भई वह-वाह ! वह-वाह!!
दिल तो दिल से हुए हैं बेगाने
क्यों,या तो मै जानूं या तू जाने
koun badla hai yaha
bahuthi achha kaha hai aajkal sabhiapne tarike se hi jina chahtehain aur isiliye rishte shayad kamzor ho gaye hain
bahut dino ke baad pada bahut achha laga
acchi lagi aapki abhivyakti...
nav varas ki subh kamnayen.....
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं
-----नयी प्रविष्टि
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bahut badhiyaan!
बहुत बढ़िया....आखिरी शेर ज्यादा पसंद आया!
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