10 July 2008

अब रिश्ता ख़तम करना लाज़मी हो गया...

कुछ महीनों पहले लिखी ये ग़ज़ल आज फ़िर से दोहराने का मन कर रहा हैं...

अब रिश्ता ख़तम करना लाज़मी हो गया,
की मैं तुम्हारे लिए, 'आम आदमी' हो गया।

नूर था कभी जो फलक के चाँद का,
आज वोही शख्स, बंजर ज़मीं हो गया।

कभी थी मुकम्मल हर तमन्ना तुजसे,
देख आज तू, दिल में कमी हो गया।

रोशन था हर मंज़र तेरे ही ख्याल से,
अब बहे जो आँखों से, वो नमी हो गया।

छोड़ दो 'ताइर' को बस उसके हाल पर,
यादों से ही जहाँ उसका, रेशमी हो गया।

11 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

कभी थी मुकम्मल हर तमन्ना तुजसे,
देख आज तू, दिल में कमी हो गया।

रोशन था हर मंज़र तेरे ही ख्याल से,
अब बहे जो आँखों से, वो नमी हो गया।

आपका लिखा हुआ पढ़ना एक अजब सा सकून देता है ..बहुत खूब

Advocate Rashmi saurana said...

bhut sundar gajal. badhai ho.

महेंद्र मिश्रा said...

रोशन था हर मंज़र तेरे ही ख्याल से,
अब बहे जो आँखों से, वो नमी हो गया।

badhiya khyaal . sundar gajal

अनुराग said...

कभी थी मुकम्मल हर तमन्ना तुजसे,
देख आज तू, दिल में कमी हो गया।


kya bat hai.......bahut khoob....

Fighter Jet said...

bahut accha hai...bahut behtarin....

रंजना said...

बहुत सुंदर लिखा है,बधाई...

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती

pallavi trivedi said...

अब रिश्ता ख़तम करना लाज़मी हो गया,
की मैं तुम्हारे लिए, 'आम आदमी' हो गया।
bahut badhiya...

kmuskan said...

अब रिश्ता ख़तम करना लाज़मी हो गया,
की मैं तुम्हारे लिए, 'आम आदमी' हो गया।

bahut khub likha hai

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर !

seema gupta said...

अब रिश्ता ख़तम करना लाज़मी हो गया,
की मैं तुम्हारे लिए, 'आम आदमी' हो गया।
"sub kuch in pankteeyon me seemt aaya ho jaise"
comendable