20 June 2008

रात भर...

शोर-ए-सन्नाटा में हम जागते हैं रात भर,
बीते लम्हों में लम्हें गुज़ारते हैं रात भर।

यारों के संग जहाँ मौज मस्ती थी कभी,
उन्ही गलियों से वो पल मांगते हैं रात भर।

बादलों से छुप छुप कर झाँख रहे चाँद में,
एक शख्स की सूरत हम तराशते हैं रात भर।

माहोल-ए-तन्हाई में सिगरेट-ओ-अल्फाज़,
धागा-ए-धुएँ से ग़ज़ल बांधते हैं रात भर।

सब हकीकत दिन में दिखा दे जहाँ मगर,
'ताइर', सपनें क्यों भला भागते हैं रात भर?

12 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

धागा-ए-धुएँ से ग़ज़ल बांधते हैं रात भर।

क्या ग़ज़ल बाँधी है ताईर मिया.. बहुत खूब एक एक शेर लाजवाब है

रंजू ranju said...

बादलों से छुप छुप कर झाँख रहे चाँद में,
एक शख्स की सूरत हम तराशते हैं रात भर।

बहुत ही सुंदर ..बेहद अच्छी लगी यह

Rajesh Roshan said...

इसी को कहते हैं शब्दों को उलझाना और उससे कही जायदा शब्दों को सुलझाना

अल्पना वर्मा said...

बादलों से छुप छुप कर झाँख रहे चाँद में,
एक शख्स की सूरत हम तराशते हैं रात भर।

wah kya baat kahai hai aapne!

DR.ANURAG said...

माहोल-ए-तन्हाई में सिगरेट-ओ-अल्फाज़,
धागा-ए-धुएँ से ग़ज़ल बांधते हैं रात भर।

mere dil ki baat......

Udan Tashtari said...

वाह वाह, बहुत खूब. और लिखिये.

श्रद्दा जैन said...

Taeer aapki gazal padhi har ek sher nagine ki tarah tha
bahut bahut achha laga aapko padhna

manishi... said...

एक उम्दा ग़ज़ल जो लिखी है 'तईर'
ग़ज़ल नही, बस लगती है शेरो की बारात भर!!

बहुत खूब!!

Neela Assman said...

WOW!!
Wordless..speechless..
Wonderfull creation!!
keep it up!!

Saee_K said...

fantastic outstanding mindblowing..chautha shabd..yaad nahi aa raha :D

bahut badhiya ghazal

माहोल-ए-तन्हाई में सिगरेट-ओ-अल्फाज़,
धागा-ए-धुएँ से ग़ज़ल बांधते हैं रात भर।

yeh to maano shabd nahi iski taareef karne ke liye..

likhte rahe..

Advocate Rashmi saurana said...

vha aapki kavita ka to javab hi nahi hai. bhut badhiya.

seema gupta said...

बादलों से छुप छुप कर झाँख रहे चाँद में,
एक शख्स की सूरत हम तराशते हैं रात भर।
"wah bhut khub"